हमारी कालोनी में पानी की समस्या बड़ी विकट  हो चली थी। इससे सभी परेशान थे। शेफी भी इससे अछूती नहीं रह पा रही थी। तनाव की एक महीन सी परत फेवीकोल की तरह शेफी के चेहरे पर चिपकी रहने लगी थी। आखिर हो भी क्यों न क्योंकि एक सप्ताह होने को आया था और नल से पानी की एक बूंद तक नहीं टपकी थी। रसोई के नल को आस भरी नज़रों से देख कर आंसू टपकाते हुए मानो शेफी यह कहना चाह रही हो कि पानी की सप्लाई लाइन में बेशक पानी की एक बूंद न हो, लेकिन उसकी नयनों की गंगा में तो सूखा नहीं पड़ा है अभी। वह आंसू पी-पी कर प्यास बुझाने का प्रयत्न करने लगती थी।

शादी के शुरूआती मधुमासी दिनों में मेरी जो आदत शेफी के दिल में उतरती जाती थी - वह थी छोटी सी छोटी बात को ज़हन में पाल कर रखना और उसके समाधान की तलाश में माथे पर रेखाएं उभार कर चहलकदमी करते जाना। टहलकदमी करते हुए कंठ सूख जाने पर मैं फ्रिज में से बोतल निकाल लेता था और गट - गट - गट करते हुए पानी पीने लग जाया करता था.. । उस वक्त मेरा सूखा कंठ तर हो जाया करता था और मेरी फड़कती हुई नसें थम जाया करती थीं। वह तब बेसुध हो कर मेरी सांसों में घुल - मिल जाया करती थी और तख्ती से खड़िया मिटाने के अंदाज़ में मेरे मस्तक पर हाथ फेरने लग जाया करती थी। इन कोमल  पलों  में वह प्रेमानुभूति से सराबोर हो कर गुनगुनाने लग जाया करती थी - - पिया का घर है, रानी हूं मैं, महारानी हूं घर की...।

 किंतु, बदली हुई स्थिति में शेफी की क्लोजअप मुस्कान क्लोज हो चुकी थी क्योंकि किसी भी तरह की नाटकबाजी से उसे घर के लिए पानी की दो बूंदें नहीं मिल सकती थीं। मेरी प्यास भी वैसी ही थी..टहलकदमी की मेरी आदत भी नहीं बदली थी। लेकिन अब मैं अपने सूखे कंठ को अपनी लार से तर करने लगता था.। इस हताशा में मैं उसांसने लगता था। पांव जमीन पर धम्म - धम्म पटकने लगता था। हथेलियों को दीवार पर पत - पत मारने लगता था जिसकी वज़ह से मेरी अंगुलियां मोटी होती जाती थीं और लाल - पीले अंगारों की तरह दहकने लगती थीं। मेरे दांतों की किटकिटाहट सूखी लकड़ियों की तरह चटकने लगती थीं। पिछले कुछ समय के मेरे व्यवहार के ऐसे असंख्य शब्द - चित्र शेफी के मन में अंकित हो चुके थे।

सुबह दफ्तर जाते समय शेफी मन मसोस कर दरवाजे में ताला लगा कर देह को पांवों के हवाले कर बैठती थी। उसकी सेंडल सड़क पर ठक - ठक पड़ती रहती थी । वह मुख्य सड़क के बस स्टॉप पर खड़ी हो जाती थी। वह उत्कंठित हो कर आती - जाती बसों को देखने लगती थी। पर वह बस स्टॉप पर उपस्थित हो कर भी उपस्थित नहीं होती थी। उसके सूखे ओठों पर चिंता की लिपस्टिक लगी रहती थी। मैं भी उसके पास खड़ा हुआ होता था, इसका उसे होश ही नहीं रहता था। पानी के बारे में उसके मन में उधेड़बुन चलती रहती थी...शहर की सड़कों पर चलायमान वाहनों की बेइंतहा कतारों की तरह..।

शाम को शेफी की धक - धक घर के पास आते - आते बढ़ने लगती थी। मेरे ज़हन में भी परेशानी फहराने लगती थी और मैं लाख कोशिश करने के बावज़ूद अपनी तर्कपटु बुद्धि का साथ नहीं दे पाता था। थोड़ी देर में घर का ताला खुलता - सड़ाक - सड़ाक। दरवाजा चर्र - चर्र करता। शेफी की सेंडल ठक - ठक करती। उसके पांव सबसे पहले किचन में जाते। मेरा चिंतामग्न मन टांगों की कदमताल से अपना जी बहलाने लग पड़ता। कुछ देर में कानों को पड़ोस के घर में पानी की मोटर के चलने का शोर - - - घर्र - घर्र - घर्र - घर्र - घर्र सुनाई देने लगता था। हमारी मोटर की आवाज़ भी शुरू हो जाती - घर्र - घर्र - घर्र - घर्र - - - । हृदय में एक लौ बलती। नल पहले थोड़ा सा फुफकारता । खाली बाल्टी में फुफकार से पानी की धार रुक - रुक कर पड़ने लगती । लेकिन कोशिश करने के बावज़ूद पानी की धार तेज नहीं हो पाती । उधर हाथ - पांव ज़बरदस्त भाईचारा दिखाने लगते, पर फिर भी इन्द्रदेव की कृपा हम पर नहीं हो पाती। कारण पड़ोस की पानी की मोटर अधिक हार्स पावर की थी। वह पानी की आपूर्ति लाइन से अपनी ओर पानी खींच लेती थी जिससे अन्य घरों में पानी नहीं आ पाता था। जब तक पड़ोस में पानी भरता, तब तक पानी चला जाता और हमें मन मसोस कर रह जाना पड़ जाता। तब शेफी मुझसे कहती - "जो है, उसी से काम चला लो।" इस मुहिम में हमारे एक - दो भांडे ही भर पाते। तीसरे की बारी जब तक आती, तब तक बिजली गुल हो जाती। मैं मिमयाने लगता। मेरी आवाज बुझने लगती। शेफी मुझे दिलासा देती - - "कल सुबह तक काम निकल जाएगा । खाने - पीने के लिए पानी हो चला है, पंच - स्नान (लोटा भर पानी से केवल आंखों की पीप साफ करना, चेहरे, हाथों और बालों को गीला करना।) से कल भी काम चला लेंगे।" चिंतातुर आंखें सूजे हुए मुंह को गोद में लिए हुए चल पड़तीं। पर सिंक में पड़े हुए झूठे बर्तन अड़ंगी मार कर शेफी को गिरा देते और उसे मुंह चिढ़ाने लगते जिससे वह इतनी कुढ़ जाती कि गुसलखाने में सोए पड़े हुए मैले कपड़ों को जगा कर अपने घर में तूफान लाने की बेवकूफ़ी नहीं करने का सही फैसला, वह ले लेती।

दीवारों के भी कान होते हैं। कभी-कभी शेफी पड़ोसपार की आवाजों को सुनने के लिए अपने कान दीवार से सटा लेती थी। वहां पर कोई अपनी घड़ी में साढ़े तीन बजे का अलार्म लगा रहा होता था। बिजली के सो जाने पर अंधेरा वैसे ही काट रहा होता था, ऊपर से पानी का सूखा नल  शेफी के मन पर बिजलियां और गिरा दिया करता था। इससे शेफी की रूह कांपने लग जाया करती थी क्योंकि पानी न आने के कारण वह कई दिनों तक अपनी नींद पूरी नहीं कर पाती थी।

मैं भी शेफी से आंखें चार नहीं कर पाता था। घर में पानी नहीं होता था, पर मैं उस पल में पानी - पानी हो जाया करता था। मैंने घड़ी में अलार्म लगा ज़रूर दिया था, पर नींद के पेड़ से जवानी की खाल तो उतरनी ही थी। मेरी सुस्त जवानी की जब तक आंखें खुलतीं, तब तक मुझे आवाजें सुनाई देने लगतीं - - - आज भी बिना - नहाए धोए दफ्तर जाना होगा, भोजन के लिए पानी कहां से आएगा, घर में धूल की कितनी लंबी परत बनती जा रही है।

शेफी ने पानी का भंडारण करना सीख लिया था। सिनटेक्स की हज़ार लीटर की टंकी के खाली हो जाने की आंशका से उसकी जान हलाल के लिए जाती हुई मुर्गी की तरह कांपने लग जाया करती थी। वह अपनी ओर से इस बात का पूरा - पूरा ध्यान रखा करती थी कि उसकी टंकी भरी रहे। वह पानी के उपयोग का भी हिसाब - किताब करने लगी थी। उसे यह अनुभव हो चुका था कि एक बाल्टी पानी से घर का कितना काम निकाला जा सकता है। पानी के भंडारण की व्यवस्था के कारण ही उसके घर में फर्नीचर से अधिक संख्या में पानी के बर्तन - भांडे दिखाई दे जाते थे।

मैं भी हर तरह के जुगाड़ बैठा कर हार चुका था। पानी की मोटर चौथे माले पर लगाने की बात समझ में आती है, मगर भूमि तल के मकान में मोटर चलाने पर भी अगर पानी न आए, तो आप क्या कर सकते हैं? उसने लोकल मोटर से लेकर क्राम्प्टन ग्रीव तक की मोटर लगा कर देख ली थी, पर जलदेवता उससे कुपित के कुपित ही रहे। मैं यह जान गया था कि मोटर हमारी कालोनी में विफल हो चुकी है, पर पानी के आने का भी एकमात्र जरिया मोटर ही थी। यहां पर पानी के आने से काम शुरू होते थे। उसी के हिसाब से कार्यक्रम बनाए जाते थे। इसलिए मोटर को सदैव दुरुस्त रखने की हरसंभव कोशिश की जाती थी। विडंबना यह थी कि वहां पर लोग आपस में दुआ - सलाम बाद में किया करते थे, पूछते पहले यह थे कि - "पानी आया कि नहीं?" एक तरह से यह उनका तकिया कलाम सा बन गया था।

मुझे न केवल पानी लाने की व्यवस्था करनी होती थी, अपितु पानी के आने के बाद का भी शासन चलाना होता था। मुझे मोटर चलाने और पानी की टंकी के भरा होने या खाली होने का पता लगाने के लिए छत के न जाने कितने चक्कर लगाने पड़ते थे। जब मेरी नई - नई शादी हुई थी, तब मैं गुनगुनाते हुए टंकी देखने छत पर जाया करता था - अब मेरी चुप्पी बदली हुई परिस्थिति को बयान कर देती थी। मेरे आलसी स्वभाव और बौद्धिक कर्म ने मुझे और अधिक कामचोर बना दिया था। यदि नल से गंदे पानी की भी आपूर्ति होती, तो मैं उसको स्टोर करके रख लेता था। इस मस्ले पर हम दोनों की कितनी बार कहासुनी हो जाया करती थी। शेफी सफाई पसंद थी। वह मुझसे टंकी में घुस कर धूल के एक - एक कण को साफ करने की जिद किया करती थी जोकि मुझे नाग़वार गुज़रा करता था। गर्मियों में तो हालत इतनी खराब हो जाया करती थी कि कुछ पूछो मत। मुझे पानी के कैन खरीदने पड़ जाते थे। कूलर का पंखा भभके मारता रहता था। मैं गर्मी बर्दाश्त कर लिया करता था, किन्तु शेफी को गर्मी बहुत लगा करती थी। वह गर्मी के मारे बेहाल और बैचेन हो जाया करती थी। उसका दम घुटने लग जाया करता था।

आखिर, कई महीनों की तपस्या के बाद चुनावी नूरा कुश्ती के समय वह दिन भी आया जब पानी सुबह-सुबह अपने नियत समय पर आ गया। कालोनीवासियों के बीच खुशी की लहर दौड़ पड़ी । लोग भाग - भाग कर अपनी - अपनी छतों पर पहुंचने लग गए। उन्होंने अपनी - अपनी टंकियों के ढक्कन खोल दिए और वह बड़ी हसरत भरी निगाहों से अपनी - अपनी टंकियों को भरते हुए देखने लग गए जैसे मां अपने शिशु को दूध पीते हुए देखती है। शेफी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैंने भी राहत की सांस ली। घंटा भर बिजली फूंक कर मोटर से सभी ने पानी की टंकी भर ली। सभी निश्चिंत हो गए। मगर जब पानी इस्तेमाल किया जाने लगा, तब उसका स्वाद हमें कसैला सा लगा। ऐसा मानो किसी ने उसमें मिट्टी का तेल छिड़क दिया हो। भरी हुई टंकी और कसैले पानी में से किसका त्याग करें - यह निर्णायक सवाल कालोनीवासियों के सामने आ गया। मैंने और शेफी ने तो पानी को छान कर और उबाल कर पी लेने का मन बना लिया। किन्तु, चौधरी साहब ऐसा न कर सके। उन्हें यह प्रस्ताव जंचा नहीं। उन्होंने अपनी टंकी खाली कर दी। शेफी अपने मन को समझाते हुए बोली-

"चलो, टंकी में पानी तो भरा हुआ है। वह खाली तो नहीं है। ज्यादा से ज्यादा पानी गंदा ही तो है। उसे हम उबाल कर और छान कर साफ कर लेंगे। "

"हां, और क्या?" अपनी पत्नी की बुद्धिमत्ता पर कितना चौड़ा हो गया था मैं।

पानी के आने के दो दिन बाद भी हमारे घर के पानी का स्वाद बदला नहीं। मैंने उत्सुकतावश चौधरी साहब से पानी के बारे में पूछा। उन्हें ऐसी कोई शिकायत न थी। मैं भागा - भागा पंप आपरेटर के पास पहुँचा। उसने जो बताया, मेरे शरीर में उससे फ़ालिज़ सा पड़ गया -

"बाबू जी हम क्या करते। परसों दो बिल्लियां टैंक में लड़ते - लड़ते गिर गईं और फिर बाहर निकल नहीं पाईं। "

"तो क्या तुम पिछले दो दिनों से हमें मरी बिल्लियों का पानी पिला रहे थे?"

"बाबू जी हमने सोचा कि आपको तो इसकी जानकारी होगी। "

"नहीं, मुझे तो मालूम नहीं है। क्या तुम ढक्कन लगा कर नहीं रखते?"

"अब बाबूजी बार - बार ढक्कन उतारने और लगाने की परेशानी कौन उठाए। "

खबर सुनते ही मैं भागा - भागा घर पहुँचा। शेफी को जब यह मालूम चलेगा कि वह पिछले कुछ दिनों से मरी बिल्ली का पानी पी रही थी, तो उसके दिल पर क्या बीतेगी? वह तो जीते जी मर जायेगी? मैं घर पहुंचा। किचन में गया। सिंक में एक मकड़ी घूम रही थी। मकड़ी से मैं वैसे ही घिनाता था। भीतर ही भीतर मेरे मन में सुरसुरी दौड़ने लगी। मैं हाथ आए शिकार को कैसे छोड़ सकता था। मकड़ी को झाड़ू से मार कर, मैं उसे इतनी आसान मौत भला कैसे दे सकता था। मैंने सिंक का नल खोल दिया। पानी पड़ते ही, मकड़ी बहने लगी। मकड़ी ने खुद को समेट लिया। फिर मैंने नल बंद कर दिया। मकड़ी जान बचाने के लिए सिंक के ऊपर चढ़ने की कोशिश करने लगी। लेकिन वह बार - बार फिसल कर सिंक में गिरती जाती थी। अब मैंने सिंक की नाली के पाइप पर कैप लगा दी। सिंक में जल भरने लगा। मकड़ी सिंक में तैरने लगी। वह सिकुड़ गई थी। तभी मैंने कैप हटा दी। खरखराता पानी फच्च - फच्च - फच्च करता हुआ पाइप से निकलने लगा। मकड़ी ने सिकुड़ - मुकुड़ कर बचने की कोशिश की, पर वह विफल रही - मकड़ी पाइप से होती हुई नाली में बह गई। मेरी बेतुकी हरकत देख कर शेफी का नथुने फुलाना स्वाभाविक था क्योंकि उसके लिए पानी की बूंद - बूंद बेशकीमती थी। मेरे द्वारा यों ही पानी बर्बाद किए जाने पर वह बिफर पड़ी -

"क्या दिमाग खराब हो गया है? पानी क्यों बहाए जा रहे हो? पानी क्या ऐसे ही मिल जाता है?"

"जानती हो, कौन सा पानी इस्तेमाल कर रही थीं तुम?"

"हाँ, जानती हूँ!"

"क्या? तुम यह जानती हो कि पानी के टैंक में बिल्लियां मर गई थीं और तुम वही पानी पी रही थीं। "

"हां, बिल्कुल!"

"और तुम ...."मैं फक्क रह गया था क्योंकि शेफी फूलकुमारी थी। वह केवल पानी की खातिर धूलकुमारी होने जा रही थी।

"मैं क्या करती फिर? पानी इतने दिनों के बाद जो आया था! ऐसे ही जाया कर देती उसे!"

"पर!"

"पर क्या? पर-वर कुछ नहीं। मैंने जो भी किया, वह सोच - समझ कर किया। तुम्हें इस पर दिमाग लड़ाने की कोई जरूरत नहीं।"मुझे बीच में ही टोकते हुए शेफी बोल पड़ी थी।

"यह आवाज कैसी है?" मैं पूछता हूं - - - ।

"मुझे कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा है!"शेफी ने जवाब दिया।

"बाहर से आवाजें आ रही हैं - - - । "

"राम नाम सत्य है! सत्य बोलो सत्य है!"

"क्या कालोनी में कोई आवाज खामोश हुई है?"

"हां! एक किराएदार को करंट लग गया है। वह मर गया है। "

"ओह, अच्छा वहां पर कौन - कौन हैं?"

"सभी हैं। किराएदार की अंत्येष्टि में जाना होगा। इतने दिनों बाद टंकी भरी है - - - अंत्येष्टि के बाद पूरा स्नान भी हो जाएगा!"

  "नहीं! तुम नहीं जाओगे!"

  "क्यों?"

  "वह हमारा क्या लगता था?"

  "लेकिन!"

  "लेकिन - वेकिन कुछ नहीं, हम स्नान करेंगे और ज़रूर करेंगे। किन्तु, उस मरी देह के लिए नहीं, बल्कि अपनी देह के लिए - - अपने जीवित शरीर के लिए! कितने दिनों बाद नहाने की इच्छा हो रही है। टंकी में पानी भी है - - - आज हम दोनों साथ - साथ नहाएंगे!" फिर हम स्नानघर में चले जाते हैं। चौधरी साहब किवाड़ पर ठक - ठक करते हुए आगे बढ़ जाते हैं।

 

महेन्द्र सिंह

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