-एक-
मिट्टी फूल
और मेरा अटूट 
भाईचारा है••
मुझको आज
दूर से
दिगन्त से
गुलाब की 
सुगंध मिली है••
मेरी आशा के
सपनों की 
कोई कली 
खिली है••
मुझे  गुलाब ने
दुर्निवार अभी
पुकारा है
अपनी ओर
खींचा है••
क्योंकि वो
अभी तो उगा है
पंखुरियों में 
फूटा है
फूला और 
जगा है••
मेरा और
इस गुलाब का
बरसों पुराना
जन्मों का
भाईचारा है
इसीलिए तो
गुलाब ने आप
मुझे पुकारा है••
 
-दो- 
तुम कौन? 
मैंने पूछा 
बस यूं ही पूछा था मैंने 
क्योंकि, 
उसकी उदासीनता
कचोटती थी मुझे••
 
मैं,  ओह!
मुझे पहचानती नहीं !
 
कितनी नादान हो ,
इतना भी नहीं जानती
मैं ही तो हूं तुम्हारा मौन
साक्षी तुम्हारे एकाकीपन का
तुम्हारी हर उलझन का••
 
नहीं, मै कभी हस्तक्षेप 
नहीं करता 
मैं तुम्हारे खालीपन को
नहीं भरता 
पर मेरा होना 
अनिवार्य है ••
मौन स्वयं से संवाद 
के लिए अनिवार्य है 
इतना भी नहीं 
समझती तुम !!
 
-तीन-
हर सड़क 
प्रलोभन सा देती
प्रतीत होती है••
हर बार 
चौराहे की सड़कें
नई मंज़िल का
पता देकर
मेरे पूर्व लक्ष्य को
बौना सिद्ध करने
लगती है••
बार-बार मन
पूर्व-निर्धारित
लक्ष्य से हटकर
प्राप्त मंज़िल 
को छोड़ 
उसकी अपेक्षा
बेहतर लक्ष्य 
और चुनौती देती
मुश्किल मंज़िल की
कामना में तोलने 
लग जाता है••
अपने सामर्थ्य को
बार-बार लक्ष्य 
बदलने पर मन में 
तकलीफ तो होती है••
मगर हर बार
दुरूह मंजिल और
परिवर्तन का
इच्छुक मन
चल ही पड़ता है
किसी नये मार्ग पर
पूरा साहस
बटोर कर••
 
-चार-
हर फागुन सा 
रंग गया ये तन
धरती की तरह
कितने ही रंगों में••
पर,
आसमां की तरह 
विस्तृत मेरे मन के 
कैनवस पर
बिखरे ये रंग
धुल-पुंछ जाते हैं 
जैसे 
घटाओं के 
बरस जाने पर
मेघ-आच्छादित 
आसमान हो••
कोई रंग 
कभी गहरा
चढ़ता ही नहीं••
मन की परतों को
कभी छूता ही नहीं 
इंद्रधनुष की तरह
मिट जाती है
हर बार मेरे 
मन की रंगोली••
 
 
परिचय :-
*निवास स्थान : जयपुर (राजस्थान)
*माता-पिता से कविता लिखने का शौक प्राप्त हुआ
*कला में रूचि 
*राजस्थानी लोक शैली का चित्रांकन मांडना में सिद्धहस्त  
 
 
न्यूज़ सोर्स : wewitness literature