हिंदी साहित्य में शेरो-शायरी  भी अपनी गहरी पैठ बनाती जा रही है। मंचों पर अनेक नामी-गिरामी हिंदी के रचनाकार शेर सुनाकर श्रोताओं के कहकहे और वाहवाही बटोरते हैं। चंद पंक्तियों में गहरी संवेदना का संचार करने का यह माध्यम वास्तव में बेहद मक़बूल है। यहाँ आज एक शायर श्री राजीव कुमार बांगिया के कुछ शेर पेश कर रहा हूँ। 

 

 

 

 

 

 

 

-एक-                                                                                                                       

मगर कितने खूबसूरत हैं, ये तो मेरे दिल से पूछे कोई

गुजर गई जिंदगी दूसरों के नजरिए का ख़्याल रखते-रखते

 

-दो-

है ये किस्मत अपनी-अपनी, कोई गिला भी क्या करना 

किसी के पास वक्त नहीं और किसी का वक्त कटता नहीं 

 

-तीन-

पूरी कायनात में तेरी बेरूखी का अजीब आलम देखा है मैंने

कहीं रोटी नहीं और कहीं दौलत का दरिया बहते देखा है मैंने

 

​-चार-

ये ठोकरे हैं जिनसे तकदीर बनाई जाती है

वरना यूें तो लकीरें हर हाथ में पाई जाती हैं

 

​-पाँच-

चिरागों ने दिल से न बढ़ाया होगा हाथ दोस्ती का हवा की तरफ

वरना ऐसी भी कौन सी दुश्मनी है जिसे कभी सुलझाया न सके

 

​-छह:-

ज़हर देकर तुम मुझे मारने पर क्यों आमादा हो

अपने चेहरे से सिर्फ तुम नकाब हटाकर तो देखो

 

​-सात-

हर कोई खुद को खुदा मान बैठा हैं यहां 

मुझे इस शहर में बस आदमी ही रहने दो

 

​-आठ-

इक तूफां सा उठा है बदन में मेरे 

ज़रूर अंगड़ाई ली होगी उन्होने

 

​-नौ-

इक तूफां सा उठा है बदन में मेरे

ज़रूर अंगड़ाई ली होगी उन्होने

 

​-दस-

मस्ती में दिन, कहकहों में अपनी शाम गुजरती थी

मोहब्बत तुझ से पहले, अपनी सकून से गुजरती थी

 

​-ग्यारह-

तेरे जमाल का क्या असर रहा, ये तो तू ही जाने 

अपनी तो जान पर बन आई है, हम तो यही जानें

 

​-बारह-

तुम्हें क्या खबर अपने हुस्न-ओ-जमाल की

पूछो तो बताऊं ये कयामत यूं ही नही आई है

 

​-तेरह-

शहर में भरमार है दंगों में जलते हुए मकानों की

आदमी ने खोज लिया है नया तरीका रोशनी का

 

​-चौदह-

जितनी शिद्दत के साथ चाहा था मैंने उसको

उतनी ही शिद्दत के साथ बेवफाई की उसने

 

​-पंद्रह-

देख लिया उनका शबाब, शोखियां, हया और अदाएं 

अब आ भी जाए कयामत तो कौन परवाह करता है

 

​-सोलह-

खुदा के बंदो का हाल भी क्या सुनिएगा आप

खुद बेहाल है औरों को परेशान करने के लिए

 

​-सत्रह-

आज सुबह की अखबार में सफे बेहद कम दिखे मुझे,

बिन पढ़े समझ गया कि शहर में कत्ल कम हुए होंगे

 

-अठारह-​

क्या नहीं था पढ़ने को आज सुबह की अखबार में 

बस हर सफा ही महरूम रहा किसी भी खबर से

 

​-उन्नीस-

​हर सुबह मैं रंजो-गम में डूब जाता हूँ 

अखबार की सुर्खियां ही तो पढ़ता हूँ

 

​-बीस-

​कोई हो जो मेरी खुद से सुलह करवा दे

दिल मेरा मुझसे ही ख़फा रहने लगा है।

 

 

लेखक-परिचय 

राजीव कुमार बांगिया भारतीय संसद के राज्य सभा सचिवालय में संयुक्त निदेशक हैं तथा वह काफी समय से साहित्य सृजन में दत्तचित्त हैं। कई पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। जीवन में सतत संघर्षशील रहे बांगियाजी अपनी कर्मठता के बलबूते पर निष्ठा और ईमानदारी से कार्य करते हुए एक प्रतिष्ठित पद पर कार्यरत हैं। उनकी ज्योतिष शास्त्र में भी गहरी रूचि है; इसके अतिरिक्त, वह विभिन्न प्रकार के साहित्यिक और गैर-साहित्यिक अनुवाद-कौशल में भी दक्ष हैं। 

न्यूज़ सोर्स : Literature Desk