वैश्विक हिंदी मंच नामतः "सान्निध्य लन्दन-संवाद" के तत्वावधान में दिनांक: १० अक्टूबर, २०२१ को इकतीसवें कहानी सत्र का आयोजन किया गया।  इस कहानी सत्र के सूत्रधार थे--वरिष्ठ कथाकार, कवि, समीक्षक और आलोचक ललित मोहन जोशी जी।  इस सत्र में लखनऊ से ब्रिटेन पधारी हिमानी जोशी जी और ब्रिटेन की ही वरिष्ठ कथाकार कादम्बरी मेहरा जी ने अपनी-अपनी कहानियों का सस्वर पाठ किया।  कार्यक्रम की प्रस्तोता थीं : सुश्री जालान और इन कहानीकारों की कहानियों के समीक्षक थे : वरिष्ठ उपन्यासकार और आलोचक-- हरियश राय जी।  

आरंभ में, ललित मोहन जोशी जी ने दोनों कथाकारों की रचनाधर्मिता और उनकी साहित्यिक पृष्ठभूमि के बारे में विस्तृत जानकारी दी। तदनंतर, हिमानी जी ने अपनी चर्चित कहानी 'अधूरी कहानी' का पाठ किया जिसमें उन्होंने कथावस्तु का तानाबाना एक बड़े फलक पर बुना है। यह कहानी मूल रूप से एक बहुकोणीय प्रेम कहानी है जिसमें पाकिस्तान से इंग्लैंड आए व्यक्ति (साहिल) की पहले से एक पत्नी (सफीना) है जबकि पाकिस्तान प्रवास के दौरान उसका प्रेम-संबंध किसी रोशनी नाम की स्त्री से स्थापित हो जाता है। उसके अपने प्रवास के दौरान, एक तीसरी स्त्री आशा के सान्निध्य में प्रेम अंकुरित होता है जबकि प्रेम का परवान चढ़ने से पहले ही दोनों का विछोह हो जाता है। इस पूरे प्रकरण को हिमानी जी अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर जाकर पृष्ठभूमि, चरित्र तथा मानवीय संबंधों का संजाल तैयार करती हैं एवं साहिल और आशा की मुलाकातों के बाबत बड़ा मनोवैज्ञानिक और दिलचस्प वर्णन प्रस्तुत  करती हैं। कहानी का अंडरटोन हृदयस्पर्शी है जबकि हिमानी भौगोलिक सीमाओं को लांघकर प्रेम का परचम लहराना चाहती हैं। इस कहानी में यथार्थ भले ही दुर्लभ दिखता हो, मानवीय स्पर्श हिलोरें लेता प्रतीत होता है। सत्र की दूसरी कथाकार कादंबरी मेहरा जी ने अपनी कहानी "टैटू" का पाठ किया जिसमें एक संवेदनशील अपराधी, जो पेशे से ज़ल्लाद है, अपने व्यवसाय के बारे में जो ब्यौरा प्रस्तुत करता है, वह भले ही पाठक के मन में जुगुप्सा का भाव पैदा करता हो, वह उसमें समाहित सहृदयता को बड़े सलीके से रेखांकित करता है। परिस्थितियां उसे सामान्य जीवन जीने की अनुमति कतई नहीं देती हैं। ज़ल्लाद पिता के व्यवसाय को भले ही वह अपनी आजीविका के रूप में अपनाता है और परिस्थितिवश वह हत्या भी कर जाता है तथापि उसमें स्पंदनशील ह्रदय हमें मानवीय उदात्तता का गहरा सन्देश दे जाता है। इस प्रकार, कादंबरी जी मनुष्य के साथ आपराधिक प्रवृत्ति की सांठगांठ को खुले दिल से स्वीकार तो करती हैं तथापि वह मनुष्य में मनुष्यता को मुखर करने में बड़े दिलचस्प ढंग से अगुवाई कराती हैं। समीक्षक हरियश राय उनकी कहानी-कला की भूरि-भूरि प्रशंसा करने से नहीं चूकते और कथाकार को यह  मशविरा दे जाते हैं कि वह इसी कथावस्तु को एक उपन्यास के रूप में विकसित करें तो बेहतर होगा। दोनों कहानियों के संबंध में हरियश की समीक्षा अत्यंत विश्लेषणात्मक और सारगर्भित थी जिसे मंच पर उपस्थितों और श्रोताओं ने तहे-दिल से सराहा। 

कार्यक्रम का समापन करते हुए ललित मोहन जोशी ने कहानीकारों, टिप्पणीकारों, समीक्षक और श्रोताओं को धन्यवाद ज्ञापित किया। 

(प्रेस विज्ञप्ति)

 

 

 

 

(प्रस्तुति : डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र)

न्यूज़ सोर्स : Literature Desk of WEWITNESS