एक हालिया साहित्यिक जलसे में जब से ऊँट-सरीखे साहित्यकारों के श्री-मुख से मैंने यह सुना है कि सुनने वाली और पढ़ने वाली कहानियाँ अलग-अलग किस्म की होती हैं, तब से चिंता-चिता में धूं-धूं कर जल रहा हूँ। चुनांचे, मेरी कलम सुनने वाली कहानियों को लिखने से साफ इनकार कर दे रही है। कहती है कि ‘मुझे क्यों तकलीफ़ देते हो? अपने मन में ही कोई कहानी गढ़ लो और लोगों को सुना दो।‘ मैं परेशान हो गया हूँ कि आख़िर, लंबी-लंबी कहानियों को मन में कैसे गढ़ा जा सकता है? मैंने उससे कहा कि तुम तो कहानियों के साथ बड़ा भेदभाव कर रही हो। इस पर वह उखड़कर बोली, ‘भेदभाव मैं नहीं, तुमलोग कर रहे हो। अच्छी-भली कहानियों को वर्ग-वर्ण में बाँट रहे हो। सुनने वाली और पढ़ने वाली कहानियों के बीच भी ऊँच-नीच की खाई खोद रहे हो।‘

बहरहाल, कलम की शक्ति के आगे तो मैं निस्सहाय हो गया हूँ और उसकी दलीलों ने मुझे निरुत्तर कर दिया है। आख़िर, जो कहानियाँ लिखी जाती हैं, उन्हें ही तो पढ़ा जाएगा। मंच-संयोजक तो यह भी कहने लगेंगे कि छपी हुई और अनछपी हुई कहानियाँ भी अलग-अलग प्रकार की होती हैं। सो, पढ़ने वाली कहानियों को पाठशालाओं में जाने दो क्योंकि मंचों पर तो अनछपी कहानियाँ ही पढ़ी जाएंगी। वहाँ भी जो कहानीकार छपी पुस्तक से कोई कहानी पढ़ने की गुस्ताख़ी करेगा, उसे एक सिरे से ख़ारिज़ कर दिया जाएगा। कहानी-पाठ के संयोजक कहने लगेंगे कि ‘कहानीकार महोदय, आपकी छपी हुई कहानियाँ पढ़ने के काबिल नहीं होती हैं।‘

एक बड़ी चिंता की बात यह भी है कि सुनाने वाली कहानियों को पुस्तकीय रूप में नहीं आने दिया जाएगा। प्रकाशक कहेगा कि यह कहानी सुनाने वाली है; इसे मैं नहीं छापूंगा। लिहाज़ा, इस विवाद में लेखक के टैलंट का तो छीछालेदर हो जाएगा। उसके लिए यह निर्णय कर पाना भी कठिन हो जाएगा कि सुनाने वाली और पढ़ने वाली कहानियों का स्वरूप कैसा होगा। एक लेखक होने के नाते मेरा संयोजकों से अनुरोध है कि वे कहानियों में इस प्रकार का विभाजन न करें, वर्ना कहानियों का भी हश्र कविताओं जैसा ही हो जाएगा।

 (समाप्त)