" थोड़ी देर रुक कर जाना ." वह चलने को हुआ ही था कि कविता ने टोक दिया . 

" मैं फ्री हो चुका हुँ . रुकने का कोई मतलब नहीं है . " वह बोला फिर थोड़ा रुका. उसने कुछ सोचा और फिर  कहा , "  आज कुछ काम भी है . मुझे थोड़ा जल्दी घर पहुंचना  है ."

" हाँ जानती हुँ , बड़ा तुम्हे जल्दी घर पहुंचना है . मेरा काम​​ भी खत्म होने को ही है .थोड़ा रुक जाते तो मैं भी तुम्हारे साथ चल देती और तुम  मुझे रास्ते में ड्रॉप कर देते ." कविता के शब्दों में आग्र्रह  से अधिक अधिकार  का भाव था . वह उसके चेहरे को कुछ देर तक पढ़ता रहा . वहां चुहलबाजी  का अठखेलन  चल रहा था और आँखों में शोख चंचलता थी .  

     उसने मन ही मन सोचा , " ठीक है रूक जाता हुँ . गाड़ी तो है ही . रास्ते में छोड़ दूंगा . " वह स्वीकृति में अपना सिर हिलाना ही चाहता था कि उसके दिमाग में लगा बेरियर धीरे से  बोल उठा  , " उन शुरूआती दिनों को  याद कर जब पहली बार कविता से सड़क पर अचानक मिला था और तब   तेरा उससे ढंग का परिचय भी नहीं था . तब  तपती  दुपहरी में इंसानियत के नाते   तूने कविता को  लिफ्ट दे दी थी .कविता के तेरी गाड़ी में बैठते ही तू  अपने जाने - बूझे रास्तों को ही भूल  गया था . तुझे यही नहीं सूझ रहा था कि आखिर  जाना कहाँ है और इधर - उधर के रास्तों पर बड़ी देर तक भटकता रहा था . . तब कविता ने कहा था , " जिस रास्ते पर चलना है , चलने से पहले उसकी पड़ताल तो कर लिया कीजिये . इस तरह भटकना तो अच्छी बात नहीं है ." इतना कहकर वह जोर से खिलखिला पड़ी थी . उस दिन के बाद उसने कई बार कविता को लिफ्ट देने की मंशा जाहिर की पर कविता ने कभी बहाना बनाते हुए इंकार कर दिया तो कभी लिफ्ट ले भी ली . फिर आज अचानक  उसी की ओर  यह प्रस्ताव . वह हाँ - ना के सकते में आ गया .

इस उधेड़ बुन में  उसने कुछ भी प्रतिक्रिया देने में स्वयं को असमर्थ पाया .उसकी जबान में शब्दों का अभाव हो गया . कुछ देर चुप रहने के बाद  वह इतना ही कह पाया , " प्लीज हठ न करो कविता , भटकाव अब मेरे   लिए   सम्भव नहीं है . मैं चलता हुँ .तुम ऑटो कर लेना ." 

 

 

न्यूज़ सोर्स : Independent Writer