सुश्री दिव्या माथुर के संयोजन में लन्दन स्थित "वातायन--वैश्विक संगोष्ठी" के अंतर्गत साप्ताहिक आधार पर  चल रही  संगोष्ठियों के क्रम में ७६वीं और ७७ वीं संगोष्ठियों का ऑनलाइन आयोजन क्रमश: २ अक्टूबर और ९ अक्टूबर, २०२१ को किया गया। ७६वीं संगोष्ठी के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण परिचर्चा की गई जिसका विषय था: "युवाओं में गांधीजी की प्रासंगिकता"। इस संक्रमणशील दौर में यह विषय अत्यंत विचारणीय है क्योंकि गांधीजी के वैश्विक और राष्ट्रीय छवि में काफी कुछ बदलाव देखने में आए हैं और विशेषतया भारतीय युवा उन्हें भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से आंक रहे हैं। किन्तु, दार्शनिक और वैचारिक रूप से गांधीजी की शख्सियत में लेशमात्र भी कमी नहीं आई है। गांधीजी सर्वकालिक रूप से जनमानस में विराजमान रहे हैं और रहेंगे। उक्त परिचर्चा की अध्यक्षता श्री विजय राणा ने की थी जबकि चर्चा के प्रस्तोता आयुष चतुर्वेदी थे। वक्ता थे: आराधना झा श्रीवास्तव, अभिषेक त्रिपाठी, मधु कुमारी चौरसिया और आशीष मिश्रा।

"वातायन-वैश्विक संगोष्ठी" के अंतर्गत इसके आरम्भ से ही कुछ नवप्रयोग करने की संभावना को मूर्त रूप प्रदान किया गया है और इस प्रयोजनार्थ इसकी ७७वीं गोष्ठी में एक ऐसी कथाकार--कादंबरी मेहरा को मंच पर आमंत्रित किया गया जिन्होंने अपनी कहानियों में अपराधों पर काफी कुछ लिखा है। उनकी अपनी शिकायत है कि हिंदी साहित्य में अपराधों पर अधिक नहीं लिखा गया है जबकि मनुष्य और अपराध का चोली-दामन का सम्बन्ध है। 

७७वीं संगोष्ठी का आगाज़ करते हुए पद्मेशजी ने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में  कादंबरी मेहरा जी के सद्य: प्रकाशित कथा संग्रह "नीला पर्दा" की भूमिका में लेखिका के कहानी विधा में अवदान पर प्रकाश डाला।  तदनन्तर, मंच-संचालिका हंसा दीप ने कादंबरीजी के कथा संग्रह "नीला पर्दा" में संकलित कहानियों और उनकी विषय-वस्तुओं के बारे में विस्तार से बताया तथा कथाकार के बारे में समीचीन जानकारी भी प्रदान की। कथाकार और उनकी कहानियों के बाबत चर्चा के प्रतिभागी वक्ता थे: जय प्रकाश पांडेय और डॉ. नूतन पांडेय। दोनों वक्ताओं ने कथाकार के कहानी-लेखन के विविध पक्षों पर ध्यान आकर्षित किया; प्रत्युत्तर में लंदनवासी कादंबरी ने बताया कि हिंदी में अपराध-विषयक साहित्य की बहुत कमी है और जो हिंदी साहित्य पश्चिम के देशों में पहुंचता है, उसका स्तर निम्न कोटि का होता है। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदी में तर्कसंगत साहित्य का अभाव है; चुनांचे, उनके इस विचार से सहमति-असहमति की स्थिति बनी रही। 

अस्तु, ७७वीं संगोष्ठी हिंदी साहित्यकारों को आत्ममंथन करने के लिए प्रेरित कर सकती है ताकि वे अपराध-जगत के विभिन्न पक्षों पर लिखते हुए ऐसे साहित्य से हिंदी साहित्य को समृद्ध बना सकें। 

कार्यक्रम का समापन करते हुए पदमेशजी ने सभी श्रोताओं, प्रतिभागी वक्ताओं और आमंत्रित कथाकार को धन्यवाद ज्ञापित किया। 

(प्रेस विज्ञप्ति)

 

 

(प्रस्तुति: डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र) 

 

न्यूज़ सोर्स : Literature Desk of wewitness